बादल की आत्मकथा हिंदी निबंध Autobiography of Cloud Essay in Hindi

Autobiography of Cloud Essay in Hindi: जी हाँ, मैं एक बादल हूँ। आकाश के आँगन में मैं शिशु के समान क्रीड़ा करता हुआ इधर-उधर विचरण करता हूँ। मैं कवियों का कल्पनाविलास हूँ, कलाकारों की प्रेरणा हूँ, संगीतज्ञों की रागिनी हूँ, वियोगियों की अंतर्व्यथा का प्रतिबिंब हूँ, किसानों की आशा हूँ और संसार का जीवनदाता हूँ।

बादल की आत्मकथा हिंदी निबंध - Autobiography of Cloud Essay in Hindi

बादल की आत्मकथा हिंदी निबंध – Autobiography of Cloud Essay in Hindi

बादल कैसे बना?

मेरा यह गीला रसीला रूप ग्रीष्मदेवता का पवित्र आशीर्वाद है। वैशाख और जेठ की तप्त किरणों से प्रभावित होकर एक दिन मैंने जलरूप छोड़कर बाष्परूप धारण किया। अपने इस रूप में मैं बहुत हल्का-फुल्का गुब्बारे की तरह बन गया। धरती को छोड़ा तो सीधे आसमान पर पहुँच गया। धीरे-धीरे मैं बड़ा बादल बन गया। इस प्रकार मेरी देह धुआँ, पानी, प्रकाश और हवा से बनी हुई है।

बरसने से पहले

पहले मैं सागर की लहरों की गोद में खेल रहा था, फिर मैंने भाप के रूप में आकाश की यात्रा की और बादल के रूप में आसमान का बादशाह बन बैठा। तब मेरे तन और मन में यौवन का उन्माद था, अंग-अंग में मस्ती थी, हृदय में सारे संसार के लिए मर मिटने की तमन्ना थी। हम बहुत-से बादल आपस में टकराते और अपनी-अपनी शक्ति आजमाते थे। उस समय जो कड़कड़ाहट होती थी उससे सारा आकाश खुशियों से भर जाता था। बिजली मेरी प्रियतमा है। मेरे साँवले रंग पर वह दीवानी है।

बरसने से पहले हम बहुत गर्जनाएँ करते हैं। हमारी गर्जना सुनकर लोग तथा पशु-पक्षी बहुत खुश होते हैं। जंगलों में मोर नाचने लगते हैं, पपीहे अपनी मधुर आवाज में मेरा स्वागत करते हैं। परदेसियों को अपने घर की याद सताने लगती है। किसानों की खुशी का तो कहना ही क्या? हल-बैल लेकर वे अपने खेत की ओर निकल पड़ते हैं। मानो सारी पृथ्वी पलकों के पाँवड़े बिछाकर हमारा स्वागत करने के लिए तैयार हो जाती है।

बरसात के रूप में

एक दिन मेरी टक्कर एक बड़े बादल से हो गई। मैं संभल पाऊँ इसके पहले ही धरती की ओर गिरने लगा। ‘बादल बरसो बरसो बरसो …रे’ और ‘ घिर घिर आए बदरा कारे’ की आवाज मेरे कानों में गूंज उठी । बस ! उस दिन मैं जी खोलकर बरसा । मेरा पानी खेतों में बरसा और किसान खुशी से नाच उठे । मेरा पानी नदियों में गिरा और वे मस्ती में झूम उठी । मेरे पानी से तालाबों के सूखे शरीर फिर से पुलकित हो उठे। मेरे पानी से मैदानों में हरी-हरी घास उग आई। उसे देखकर पशुओं की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने मुझे धन्यवाद दिया।

अभिलाषा

धरती पर आकर मैंने संसार को नवजीवन दिया है। मेरे कारण प्रकृति को अनोखी छटा मिली है और धरती ने नई उमर पाई है। इसीलिए मैं संतुष्ट हूँ । बार-बार बादल बनकर संसार का कल्याण करता रहूँ यही मेरी एकमात्र कामना है।

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