एक बूढ़े कुत्ते की आत्मकथा हिंदी निबंध Autobiography of Old Dog Essay in Hindi

Autobiography of Old Dog Essay in Hindi: मैं एक कुत्ता हूँ। आपकी जानी-पहचानी जाति का एक अभागा प्राणी। आज मुझे मानवसमाज से कुछ शिकायत करनी है। इसीलिए मैं आपको अपनी आपबीती सुनाना चाहता हूँ ।

एक बूढ़े कुत्ते की आत्मकथा हिंदी निबंध - Autobiography of Old Dog Essay in Hindi

एक बूढ़े कुत्ते की आत्मकथा हिंदी निबंध Autobiography of Old Dog Essay in Hindi

जन्म और बचपन

मेरा जन्म गाँव के एक किसान के घर में हुआ था । मैं अपनी माँ की लाड़ली संतान था । हम पाँच-छह भाई-बहनों ने एकसाथ जन्म लिया था। माँ ने बड़े प्यार से हमारा पालन किया और अपने मीठे दूध तथा यहाँ-वहाँ के रोटी के टुकड़ों से हमें पुष्ट किया। जब हमने चलना सीख लिया तो आसपास के बच्चे मुझे उठाकर अपने घर ले जाने लगे। वे कभी-कभी मुझे दूध भी पिलाते थे। अपने भाई-बहनों में मैं सबसे सुंदर और स्वस्थ था, इसलिए शीघ्र ही सबका प्रिय बन गया।

मालिक के घर

एक दिन उस गाँव में एक व्यापारी आया । एकाएक उसकी दृष्टि मुझ पर पड़ी और पता नहीं उसने मुझमें क्या विशेषता देखी कि जाते समय वह मुझे अपने साथ लेता गया। बिदा का वह दृश्य मैं जीवनभर नहीं भूल सकता। मुझे अलग होते देखकर मेरी माँ और भाई-बहन बहुत बेचैन हो गए थे।

सुखी जीवन

उस व्यापारी के घर में बहुत-से बच्चे थे। मेरे पहुंचते ही सबने मुझे अपना मित्र बना लिया। मालकिन ने मुझे अपनी गोद में बिठाया और मेरी पीठ पर हाथ फेरा । मेरा नाम ‘टीपू’ रखा गया । बढ़िया खाना, दिनभर आराम और सबका लाड़-प्यार ! जंजीर होते हुए भी मैं आजाद रहता था ! आगंतुकों को देखकर मैं भौका करता था। एक बार मालिक के घर में रात को कुछ चोर घुस आए। उनके आते ही मुझे शंका हुई और मै भौंकने लगा। एक चोर के पैर में मैंने अपने पैने दाँत गड़ा दिए। सब लोग जाग गए । देखा कि आँगन में गहनों की पेटी पड़ी है। मेरे भौकने और काटने से चोर सबकुछ छोड़कर नौ दो ग्यारह हो गए । सबने मेरी बड़ी तारीफ की।

बुढ़ापा और उपेक्षा

किंतु समय गुजरने के साथ मेरे उत्साह, शक्ति और रंगरूप फीके पड़ते गए। धीरे-धीरे मैं मालिक के घर में सबकी उपेक्षा का पात्र बनता गया। एक दिन मालिक का पुत्र ‘बुलडॉग’ जाति का एक नया कुत्ता ले आया। मैंने भौं-भौं करके अपना विरोध प्रकट किया, किंतु डंडे मारकर मुझे घर के बाहर निकाल दिया गया।

उपसंहार

आज मैं यहाँ-वहाँ घूमकर अपनी शेष जिंदगी काट रहा हूँ । जाड़े की ठिठुरन ने मेरे जीवन को अधमरा बना दिया है । सोचता हूँ, क्या मेरा मालिक और साल-छ: महीने मुझे रोटी नहीं खिला सकता था? पर मनुष्य तो ठहरा स्वार्थ का पुतला ! उसमें इतनी दया कहाँ कि वह मेरे हृदय की व्यथा को समझ पाए।

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