भ्रष्टाचार एक भस्मासुर हिंदी निबंध Corruption in India Essay in Hindi

भ्रष्टाचार एक भस्मासुर हिंदी निबंध Corruption in India Essay in Hindi: एक राक्षस ( असुर) था। उसने अपनी तपस्या से शिवजी को प्रसन्न कर लिया। शिवजी ने उसे वरदान दे दिया कि वह जिस पर भी हाथ रखेगा वह जलकर भस्म हो जाएगा। वह ऐसा ही करने लगा। इसीलिए उसका नाम ‘ भस्मासुर ‘ पड़ गया।

भ्रष्टाचार एक भस्मासुर हिंदी निबंध Corruption in India Essay in Hindi

भ्रष्टाचार एक भस्मासुर हिंदी निबंध Corruption in India Essay in Hindi

भस्मासुर और भ्रष्टाचार की तुलना

भ्रष्टाचार उसी भस्मासुर की तरह है। वह जीवन के हर पहलू को छू रहा है। वह एड़ी से चोटी तक फैला हुआ है। उसके स्पर्श से पूरा वातावरण दूषित हो रहा है। आदर्शों के महल धूल में मिल रहे हैं । वह भस्मासुर की तरह हमारे जीवन के श्रेष्ठ मूल्यों, ऊँचे आदर्शों और संस्कारों को भस्म कर रहा है।

भ्रष्टाचार के रूप

भ्रष्टाचार के अनेक चेहरे है। शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। शिक्षणसंस्थान दूकानें बन गए हैं। बिना डोनेशन के स्कूलों में बच्चों को भर्ती नहीं किया जाता । पैसों के लिए प्रश्नपत्र बेचे जाते हैं। पैसे लेकर अंक बढ़ा दिए जाते है। हजारों की रकम देकर बिना पढ़े या बिना परीक्षा दिए भी प्रमाणपत्र मिल जाता है।

भ्रष्टाचार का परिणाम

बाजार में भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। सर्वत्र नकली चीजों की भरमार है । खाने-पीने की चीजों में मिलावट है । दूध में पानी मिलाना तो अब बहुत पुरानी बात हो गई है। सरकारी दफ्तरों में हर स्तर पर घड़ल्ले से रिश्वत ली जाती है। रेलवे का टिकट टिकट-कार्यालय में नहीं मिलेगा, पर एजेंटों द्वारा काला बाजार में जरूर मिल जाएगा। चुनावों में भी भ्रष्टाचार है। चुनावों में फर्जी मतदान आम बात हो गई है। इस प्रकार आजकल भ्रष्टाचार सर्वव्यापी बन गया है।

कारण और निवारण

भ्रष्टाचार के कारण हमारा समाज का स्वस्थ विकास नहीं हो पा रहा है। देश की उन्नति में बाधा पहुंचा रही है। सामाजिक न्याय नहीं हो पा रहा है। लोग चरित्र-भ्रष्ट हो रहे हैं। समाज में छल-कपट, झूठ-बेईमानी, धोखेबाजी का बाजार गरम हो रहा है। बिना पसीना बहाए करोड़पति बनने की लालसा अनैतिक और गैरकानूनी प्रवृत्तियों को जन्म दे रही है।

उपसंहार

भ्रष्टाचार Corruption in India का मूल कारण आज की उपभोक्तावादी संस्कृति है। भौतिक वस्तुएँ पाने का आकर्षण दिन-पर-दिन बढ़ता जा रहा है। भौतिक महत्त्वाकांक्षाएँ ही गलत ढंग से आमदनी बनाने के लिए मनुष्य को मजबूर कर रही हैं। भ्रष्टाचार दूर करने के लिए लोगों को अपनी इन्हीं महत्त्वाकांक्षाओं पर नियंत्रण पाना होगा। नैतिक शिक्षा को बढ़ावा देना होगा और भ्रष्टाचारियों को कठोर दंड की व्यवस्था करनी होगी।

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