मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना हिंदी निबंध Mazhab Nahi Sikhata Aapas Mein Bair Rakhna Essay in Hindi

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना हिंदी निबंध Mazhab Nahi Sikhata Aapas Mein Bair Rakhna Essay in Hindi: आजकल आए दिन धर्म के नाम पर होनेवाले संघर्षों के समाचार मिलते रहते हैं। कहीं इंदु मुस्लिम दंगे भड़क रहे हैं। कहीं ईसाई धर्म का पालन करनेवाला इजराइल अपने पड़ोसी मुस्लिम देशों से लड़ रहा है। कभी-कभी तो एक ही धर्म के भिन्न-भिन्न संप्रदाय आपस में टकरा जाते हैं । इसका कारण अपने-अपने धर्म को श्रेष्ठ मानने की भावना है। धार्मिक कट्टरता का भाव ही सारे धार्मिक संघर्षों की जड़ है।

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना हिंदी निबंध Mazhab Nahi Sikhata Aapas Mein Bair Rakhna Essay in Hindi

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना हिंदी निबंध Mazhab Nahi Sikhata Aapas Mein Bair Rakhna Essay in Hindi

सभी धर्मों में मानव-एकता का महत्त्व

धर्म के नाम पर परस्पर लड़नेवाले यह नहीं सोचते कि वास्तव में सभी धर्म एक ही सत्य पर आधारित हैं। यह सत्य है-मानवता अर्थात मनुष्य का मनुष्य के प्रति प्रेम, करुणा, दया, मैत्रीपूर्ण व्यवहार । हिंदू, बौद्ध, इस्लाम, ईसाई, सिख आदि सारे धर्म सहिष्णुता की सीख देते हैं। ‘अहिंसा परमो धर्म:’ की भावना सभी धर्मों में मिलती है । बाइबिल में ईसा को सूक्ति – Love thy neighbour as thyself और गीता में श्रीकृष्ण कथन, “आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स: पंडितः”  एक ही सत्य को प्रतिबिंबित करते है।

धार्मिक नेताओं के स्वार्थ या राजनीतिक शतरंज

कोई भी मजहब अपने अनुयायियों को लड़ना नहीं सिखाता। फिर भी मजहबी हिंसा से इतिहास भरा पड़ा है। मजहबी लड़ाइयों के पीछे धर्मों के कट्टर नेताओं और राजनीतिज्ञों के स्वार्थ छिपे रहते है। भारत जैसे देश में धर्म अलगाववाद का माध्यम बन गया है।

मजहब के नाम पर आपसी बैर परिणाम

मजहब के नाम पर लड़ते रहने के कारण ही ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का आदर्श साकर नहीं हो पा रहा है। धर्म पर आधारित शत्रुता युद्ध अथवा उपद्रव का रूप लेती है। हिंसा की आग में न जाने कितने घर और बस्तियाँ स्वाहा हो जाती है ! कितनी माताओं की गोद सुनी हो जाती है, कितनी नारियों की मांग का सिंदूर उजड़ जाता है और कितने बच्चे अनाथ होकर दुर्भाग्य को झेलने के लिए विवश हो जाते हैं ! धर्म के नाम पर खेली जानेवाली खून की होलियाँ जीवन की दीपावलियों का गला घोंट देती हैं।

धर्मयुद्धों का उल्लेख

विश्व-इतिहास के पृष्ठ धर्मयुद्धों के रक्त से रँगे हुए हैं। ईसाइयों और मुसलमानों में हुए क्रुसेड और केथोलिकों द्वारा प्रोटेस्टेन्टो की हत्याएँ कौन नहीं जानता? छत्रपति शिवाजी को ‘गो-ब्राह्मण’ की रक्षा के लिए विवश होकर मुगलों से लड़ना पड़ा था। भारत का विभाजन भी तो धर्म के आधार पर ही हुआ है।

सर्वधर्मसमभाव की आवश्यकता 

दुख की बात है कि लोग धर्म के मर्म को नहीं जानते । वे अपने धर्मों को दूसरे धर्मों से अलग मानते हैं। जब कि धर्म हमें कभी अलगाववाद की शिक्षा नहीं देता। सभी धर्म हमें ईश्वर, सत्य और मानवता की ओर ले जाते हैं और भाईचारे की प्रेरणा देते हैं। आज की दुनिया में धार्मिक कट्टरता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए । धार्मिक कट्टरता को आज सर्वधर्मसमभाव में बदलने की जरूरत है। ऐसा होने पर ही मानव-मानव के बीच की दूरी मिट सकती है और हम धरती पर सुख-शांति लाकर इसे स्वर्ग बना सकते हैं। Mazhab Nahi Sikhata Aapas Mein Bair Rakhna

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