माँ की ममता हिंदी निबंध Mother’s Love Essay in Hindi

माँ की ममता हिंदी निबंध Mother’s Love Essay in Hindi: जननी या माँ शब्द का उच्चारण करते ही आँखों के सामने एक ऐसी दिव्य मूर्ति खड़ी हो जाती है, जिसकी माया-ममता का कोई ओर छोर नहीं। माता की गोद में बैठने का सुख त्रैलोक्य के राज्य-सिंहासन पर बैठने के सुख से भी बढ़कर है।

माँ की ममता हिंदी निबंध Mother's Love Essay in Hindi

माँ की ममता हिंदी निबंध Mother’s Love Essay in Hindi

पशु-पक्षियों में मातृ-स्नेह

माता का स्नेह स्वाभाविक होता है। पशु पक्षियों में भी अनन्य मातृप्रेम के अनेक उदाहरण मिलते हैं। बंदरिया अपने बच्चे को सदा अपने पेट से चिपकाए रहती है। बिल्ली अपने बच्चे को मुँह में दबाकर सुरक्षित स्थान में ले जाती है, पर बच्चे के शरीर पर अपने दाँत को एक खरोच तक नहीं पड़ने देती । कंगारू पेट की थैली में ही अपने बच्चे को रखती है। गौरैया स्वयं भूखी रहकर भी अपने बच्चे को चुगाती है। यही नहीं, कई बार पशु-पक्षी अपने बच्चों की रक्षा के लिए अपनी जान तक कुरबान कर देते हैं।

अप्रतिम मातृप्रेम

मातृप्रेम की तुलना में संसार के सारे प्रेम और रिश्ते-नाते फोके जान पड़ते हैं। माँ बच्चे की मुसकराहट को देखकर स्वर्गीय सुख का अनुभव करती है। जब बच्चा रोता, बिलखता है या कभी ठोकर खाकर भूमि पर गिर पड़ता है, तब माँ उसे कितने दुलार से उठाती है और चूम-चाटकर उसका मन बहलाती है। चाहे बच्चा निकम्मा, कुरूप, मूर्ख, कुबुद्धि, पंगु, अंधा तथा मूंगा भी क्यों न हो, फिर भी उसके प्रति माता के प्रेम में कभी कमी नहीं आती। माता जिस प्रकार सुंदर, होनहार बच्चे का पालनपोषण करती है, उसी प्रकार निकम्मे बच्चे का भी करती है। बालक के रोगग्रस्त होने पर माता उसकी देखभाल में दिन रात एक कर देती है।

पितृप्रेम से तुलना

पिता का स्नेह बहुधा बदले में कुछ पाने की आशा रखता है। वह पुत्र को इसलिए पालता-पोसता और पढ़ाता-लिखाता है कि बुढ़ापे में वह घर का उत्तरदायित्व संभाल सके और उसकी सेवा करे । पुत्र निकम्मा या कपूत निकल जाए तो पिता उसे घर से निकाल देना चाहता है या उसकी शिक्षा-दीक्षा में पैसा खर्च करने से साफ इनकार कर देता है। लेकिन माता कभी ऐसा सोच भी नहीं सकती, वह ममता की मूरत जो ठहरी।

माता के प्रेम का अभाव

माता के नि:स्वार्थ और स्वाभाविक प्रेम से बच्चे में अनेक सद्गुणों का विकास होता है। माता के सदाचरण, सद्भाव और सत् प्रवृत्ति की अमिट छाप बालक के मन पर पड़ती है। माता का स्नेह ही बालक को मनुष्य बनाता है। माता का एक बार का प्रोत्साहन ही ध्रुव के लिए ध्रुव-पद की प्राप्ति का हेतु बन गया था। यदि माता जीजाबाई शिवाजी को कड़ी शिक्षा न देती तो शिवाजी छत्रपति न बन पाते । मोहन को महात्मा गांधी बनानेवाली भी उनकी माता पुतलीबाई ही तो थी। सचमुच, वात्सल्यमूर्ति माताओं ने अनेक नररत्नों का निर्माण किया है।

वात्सल्यमूर्ति माँ Mother’s Love

पुत्र कुपुत्र बन सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं बनती। सचमुच, वात्सल्यमयी माता का स्नेह अनुपम है।

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