Samajik Samanta essay in Hindi language | सामाजिक समानता हिंदी निबंध

Samajik Samanta essay in Hindi language हम मानव जाती ही आपस मे भेदभाव करते है, जाति प्रथा, भारतीय समाज के लिए अभिशाप है| जाति प्रथा भारतीय समाज को साम्प्रदायिक समूहों एवं श्रेणियों में बांटती है| संस्कृति एवं सभ्यता के विकास के बावज़ूद जाति प्रथा अब भी हमारे समाज में एक प्रबल भूमिका निभाती है| जाति प्रथा कि जड़ें प्राचीन काल तक जाती हैं| जबकि एक नज़रिया उनके मूल के आधार पर जातियों में उच्च एवं निम्न का भेदभाव करती है, दूसरा नज़रिया जातियों के मूल को वामों तक ले जाता है जो जाति प्रथा को कार्यों के आधार पर वर्गीकृत करता है| तब से यह पाया गया था कि समुदाय में दबंग हिस्से के लोगों द्वारा वर्चस्व के आधार पर अनुचित लाभ उठाया जा रहा था, जिसके फलस्वरूप समुदाय के कमज़ोर हिस्सों को भेदभाव एवं शोषण का शिकार होना पड़ रहा था|

सामाजिक समानता किसी समाज की वह अवस्था है जिसके अन्तर्गत उस समाज के सभी व्यक्तियों को सामाजिक आधार पर समान महत्व प्राप्त हो| समानता की अवधारणा मानकीय राजनीतिक सिद्धान्त के मर्म में निहित है| यह एक ऐसा विचार है जिसके आधार पर करोड़ों-करोड़ों लोग सदियों से निरंकुश शासकों, अन्यायपूर्ण समाज व्यवस्थाओं और अलोकतांत्रिक हुकूमतों या नीतियों के खिलाफ संघर्ष करते रहे हैं और करते रहेंगे| इस लिहाज से समानता को स्थाई और सार्वभौम अवधारणाओं की श्रेणी में रखा जाता है|

दो या दो से अधिक लोगों या समूहों के बीच सम्बन्ध की एक स्थिति ऐसी होती है जिसे समानता के रूप में परिभाषित किया जा सकता है| लेकिन, एक विचार के रूप में समानता इतनी सहज और सरल नहीं है, क्योंकि उस सम्बन्ध को परिभाषित करने, उसके लक्ष्यों को निर्धारित करने और उसके एक पहलू को दूसरे पर प्राथमिकता देने के एक से अधिक तरीके हमेशा उपलब्ध रहते हैं|

अलग-अलग तरीके अख्तियार करने पर समानता के विचार की भिन्न-भिन्न परिभाषाएँ उभरती हैं| प्राचीन यूनानी सभ्यता से लेकर बीसवीं सदी तक इस विचार की रूपरेखा में कई बार जबरदस्त परिवर्तन हो चुके हैं| अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लोग, जिन्हें अस्पृश्य कहा जाता है, भारत की जनसंख्या का छठा भाग अर्थात् 16 करोड़ हैं, जो भेदभाव के शिकार हैं|

उच्च निचता :
कई ग्रामीणों को जाति के आधार पर समाज से अलग किये गये हैं तथा वे ऊंची जाति द्वारा खींची गई बंटवारे की रेखा को पार नहीं कर सकते| वे उन कुओं से पानी नहीं ले सकते या उन दुकानों पर चाय नहीं पी सकते जहां ऊंची जाति के लोग जाते हों|

भेदभाव :
निचले जाति के रिहाइशी इलाकों में अक्सर बिजली, शौचालयों या पानी के पम्पों की सुविधा नहीं होती| उन्हें ऊंची जाति के लोगों के समान बेहतर शिक्षा, घर एवं चिकित्सा सुविधाओं की सुगमता की सुविधा नहीं होती|

मज़दूरी का विभाजन :
वे कुछ पेशों तक सीमित हैं जैसे साफ-सफाई, रोपाई, चर्मकारी, सड़कों की सफाई आदि|

गुलामी :
कर्ज़, परम्पराओं आदि के नाम पर पीढ़‍ियों से उनसे मज़दूर की तरह या निम्न कोटि के कार्य कराकर उनका शोषण किया जाता है| भारत सरकार ने अस्पृश्यता समाप्त करने के लिए कानून बनाए हैं तथा समाज के कमज़ोर हिस्सों के जीवन की गुणवत्ता सुधारने के लिए कई सुधार लाए हैं| और हमे भी उनकी सहायता करने चाहिए और इन्सान इन्सान ने भेद-भाव नही करना चाहिए| सबको मिल झूट करना चाहिये हमे मानवता कभी भी नही भूलनी चाहिये|

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