एस. टी. स्टैंड का दृश्य हिंदी निबंध Scenes at Bus Stand Essay in Hindi

Scenes at the Bus Stand Essay in Hindi: पिछले दिनों मैं एस. टी. बस से पूना जा रहा था। रास्ते में हमारी एस. टी. बस कल्याण स्टैंड पर रुकी। जीवन में पहली बार मैंने ‘कल्याण’ जैसे बड़े एस. टी. स्टैंड को देखा।

एस. टी. स्टैंड का दृश्य हिंदी निबंध - Scenes at the Bus Stand Essay in Hindi

एस. टी. स्टैंड का दृश्य हिंदी निबंध – Scenes at the Bus Stand Essay in Hindi

स्टैंड का वर्णन

एस. टी. स्टैंड एक विशाल मैदान में बना हुआ था। बसें खड़ी करने के लिए अलग से बड़ा अहाता था। उसके उपर टिन के पतरों की बहुत बड़ी छत थी। छत के नीचे कई बसें खड़ी थीं। स्टैंड के सामने विशाल इमारत थी। इसमें कई खंड थे। एक खंड में ड्राइवरों और कंडक्टरों के लिए आराम करने की व्यवस्था थी। यहाँ बहुत-से ‘ड्राइवर और कंडक्टर विश्राम कर रहे थे। कोई बातें कर रहा था, तो कोई नाश्ता कर रहा था।

स्टैंड के साथ एक सुंदर जलपान-गृह था। बहुत-से यात्री वहाँ चाय-नाश्ते का मजा ले रहे थे। कई यात्री खाने-पीने की चीजें मैंगवा रहे थे। बैरे उनकी फरमाइश पूरी करने के लिए दौड़धूप कर रहे थे। काफी शोरगुल हो रहा था। सभी जल्दी में थे। मैंने भी वहाँ की चाय का स्वाद लिया। जलपान-गृह से लगा हुआ प्रतीक्षा-गृह था। वहाँ बैठे हुए यात्री अपनी अपनी बस की प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछ यात्री बड़े प्रसन्न दिखाई दे रहे थे। कुछ समाचारपत्र या पत्रिका पढ़ रहे थे। कुछ यात्रियों के मुख पर यात्रा की थकान साफ नजर आ रही थी। प्रतीक्षा-गृह के पास ही पीने के ठंडे पानी की सुंदर व्यवस्था थी। एक ओर टिकट-आरक्षण करानेवालों की लंबी कतार लगी हुई थी।

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स्टैंड के बाहर कई दुकाने थीं । यात्री उनमें से सामान खरीद रहे थे। बच्चे खिलौने देखने में मग्न थे । पानवाले की दुकान पर काफी भीड़ लगी हुई थी। दुकानदार बड़ी फुर्ती से पान लगा रहा था और अपनी मीठी बातों से ग्राहकों का मन भी बहला रहा था। उसीने मुझे बताया कि कुछ साल पहले यह जगह बिल्कुल सुनसान पड़ी थीं, किंतु आज एस. टी. स्टैंड बन जाने से यहाँ रात-दिन यात्रियों का मेला-सा लगा रहता है । बस-स्टैंड के एक छोर पर अखबार का स्टॉल था। वहाँ लोग अनेक प्रकार की पत्र पत्रिकाएँ खरीद रहे थे। स्टॉल पर तेज आवाज से रेडियो बज रहा था। बस-स्टैंड के आसपास भिखारियों का भी तांता लगा हुआ था। कुछ मजदूर यात्रियों का सामान बस पर चढ़ाने या उतारने में लगे हुए थे। सचमुच, बस-स्टैंड पर बड़ी चहल पहल थी।

बस में बैठना और मन पर प्रभाव

मैं पानवाले से बात कर ही रहा था कि सीटी बजी और मैं दौड़कर अपनी बस में जा बैठा। बस रवाना हुई और मैं तब तक स्टैंड के उस दृश्य को देखता रहा जब तक वह मेरी दृष्टि से ओझल न हो गया। सचमुच, एस. टी. स्टैंड यात्रियों के लिए वरदान हैं। वास्तव में ये स्वतंत्र भारत की प्रगति के सूचक हैं।

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