देशभक्त की आत्मकथा हिंदी निबंध Autobiography of Patriot Essay in Hindi

Autobiography of Patriot Essay in Hindi: जी हाँ, मैं एक देशभक्त हूँ, मैंने देश से प्रेम किया है। देशप्रेम के मार्ग के काँटों को भी फूल मानकर चूमा है । आज अस्सी वर्ष की जर्जर आयु में भी देश ही मेरा देवता है। मेरे परदादा स्वतंत्रता की देवी रानी लक्ष्मीबाई की सेना में रहकर शहीद हुए थे। मेरे पिता लोकमान्य टिळक के कट्टर अनुयायी थे। बचपन से ही मुझे उनके विचारों और संस्कारों ने प्रभावित किया था। मेरी पाठ्यपुस्तक में एक कविता थी, जिसकी पंक्तियाँ हमेशा मेरे ओठों पर रहती थी-

“जननी का मान बढ़ाए जो, होता सपूत वह सच्चा है;
जिसको स्वदेश से प्यार नहीं, उस नर से तो पशु अच्छा है!”

देशभक्त की आत्मकथा हिंदी निबंध - Autobiography of Patriot Essay in Hindi

देशभक्त की आत्मकथा हिंदी निबंध – Autobiography of Patriot Essay in Hindi

स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेना

इन्ही पंक्तियों को गाते-गाते जब मैं हाईस्कूल से कॉलेज में पहुँचा तो देश की पराधीनता मुझे काँटे की तरह खटकने लगी। टिळक, गोखले, रानड़े आदि नेता जनता को स्वतंत्रता की प्रेरणा दे रहे थे। देश के लोग गुलामी को बेडियाँ तोड़ने के लिए बैचेन थे। सन १९२०-२१ में गांधीजी के नेतृत्व ने स्वतंत्रता आंदोलन में नई जान फूंक दी थी। मैं भी अपने कई साथियों के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ा। सविनय अवज्ञा आंदोलन, नमक सत्याग्रह और ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में मैंने दिल खोलकर भाग लिया। उनकी यादें आज भी मेरे हृदय को पुलकित कर देती हैं।

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जेलयात्रा

स्वतंत्रता के उस संघर्ष में जेल की यात्रा ही हम लोगों की तीर्थयात्रा बन गई थी। मैंने भी कई बार कारावास का स्वाद चखा। अंग्रेजों की जेलें मानवीय यातनाओं की क्रूर क्रीड़ास्थली थीं। मुझे और मेरे साथियों को घंटों तक बर्फ पर सुलाया जाता था। रहस्यों को उगलवाने के लिए हंटरों और चाबुकों से हमारी धुलाई की जाती थी। जो खाना हमें दिया जाता था, उसमें अनाज कम, कंकड़ ज्यादा होते थे। फिर भी सन १९४२ में जेलें सिनेमाघरों की तरह ‘हाऊसफुल’ हो गई थीं।

स्वतंत्रता- प्राप्ति पर हर्ष

हम लोगों के इसी त्याग-तप का यह परिणाम था कि १५ अगस्त, १९४७ को देश स्वतंत्र हुआ। उस दिन सचमुच मैं खुशी से झूम उठा था। उस दिन को मैंने उसी तरह मनाया था जैसे लोग होली-दीवाली मनाते हैं। उस दिन के आनंद-उल्लासभरे दृश्य आज भी मेरी आँखों में बसे हुए हैं।

पुरस्कार और पेंशन

मैंने कभी किसी पद की कामना नहीं की। स्वतंत्रताप्राप्ति के पश्चात मैं आदिवासियों के उद्धार में लग गया। सन १९७३ में दिल्ली बुलाकर मुझे स्वातंत्र्य सैनिक का पुरस्कार दिया गया। तबसे मुझे सरकार की ओर से पेंशन भी मिलनी शुरू हुई।

अंतिम इच्छा

अब तो मैं तन-मन से पूरी तरह थक गया हूँ । एक ओर स्वतंत्र भारत पर हृदय गर्व और स्वाभिमान अनुभव करता है, तो दूसरी ओर देश में फैली गरीबी, अशिक्षा, शोषण, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, आतंकवाद आदि बुराइयों के कारण दिल टूक-टूक हो जाता है। अब तो बस एक ही इच्छा है कि किसी तरह हमारा स्वराज’ ‘सुराज’ में बदले और मरने के पहले मैं उन सपनों को सच में बदलते देख लूँ, जो हमारे महान शहीदों ने देखे थे।

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