एक पाठशाला की आत्मकथा हिंदी निबंध Autobiography of School Essay in Hindi

Autobiography of School Essay in Hindi: मैंने अपने लंबे जीवन-काल में अनेक परिवर्तन देखे हैं । इतिहास की कई रोमांचक घटनाएँ मेरी आँखों के सामने घटित हुई हैं। मैं आपको अपने जीवन को वे ही घटनाएँ सुनाऊँगा, जो दिलचस्प हैं और जिनमें मेरे अतीत की मधुर स्मृतियाँ गूंथी हुई हैं।

एक पाठशाला की आत्मकथा हिंदी निबंध - Autobiography of School Essay in Hindi

एक पाठशाला की आत्मकथा हिंदी निबंध Autobiography of School Essay in Hindi

निर्माण

मेरा निर्माण आज से लगभग नब्बे वर्ष पहले दिल्ली शहर में हुआ था। तब देश में शिक्षा का प्रचार बहुत कम था। तभी इस नगर में लोगों को एक हिंदी पाठशाला की जरूरत महसूस हुई। धनी-मानी वर्ग के धन-दान से मेरा निर्माण हुआ। नया रूप, नई उम्र और नई चमक दमक !

लोकसेवा

निर्माण होते ही सैकड़ों विद्यार्थी मुझमें आकर शिक्षा पाने लगे। विद्वान अध्यापकों को वाणी मुझमें गूंजने लगी। मैं यह सोचकर प्रसन्न हो रहा था कि मुझमें पढ़नेवाले विद्यार्थी बड़े होकर देश और दुनिया में मेरा नाम रोशन करेंगे। न जाने कितने विद्यार्थी आए और पढ़ाई समाप्त करके चले गए। उनमें से किसी-किसी से तो मैं बहुत प्यार करता था। उस समय मुझे यह पता नहीं था कि जिस भाषा को मैं पनपा रहा हूँ, वहीं आगे चलकर भारत की राष्ट्रभाषा बनेगी । सन १९०५ का विदेशी बहिष्कार आंदोलन मुझे अच्छी तरह याद है, जब मेरे आगे विद्यार्थियों ने विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी। १९११ का वह दिन भी मैं नहीं भूला, जब जार्ज पंचम रानी मेरी के साथ मेरे करीब से गुजरे थे। राष्ट्रपिता गांधीजी के कई प्रवचन अभी तक मेरे कानों में गूंज रहे हैं, जिसे उन्होंने हमारे विद्यार्थियों के सामने दिए थे। श्री मालवीयजी का एक भाषण भी मुझे याद है, जिसे उन्होंने एक वार्षिकोत्सव के अवसर पर दिया था। तालियों की उस गड़गड़ाहट को और उनकी उस निर्मल वाणी को क्या मैं कभी भूल सकता हूँ?

अनुभव और स्मृतियाँ

सन १९४० का साल मेरे लिए क्रांतिकारी सिद्ध हुआ। बात ऐसी हुई कि मैं जर्जर हो गया था और मेरे आसपास का वातावरण भी पाठशाला के उपयुक्त नहीं रहा था। पाठशाला के लिए दूसरी जगह नया भवन तैयार किया गया और एक दिन ऐसा भी आया, जब मुझे सूना और अकेला छोड़ दिया गया। नन्हें-मुन्नों की उस दुनिया से अलग होकर मुझे जो दुख हुआ, उसे किन शब्दों में व्यक्त करूँ?

वर्तमान रूप

लगभग सात वर्ष तक मैं बनवासी जैसा जीवन विताता रहा । इतने में एक धनी आदमी ने मुझे खरीद लिया और कुछ सजा-सँवारकर मुझे धर्मशाला के रूप में बदल दिया। मेरा नाम ‘दिनबंधु धर्मशाला’ रखा गया। बस ! तबसे मैं अनेक दीन-दुखियों का निवासस्थान और हमदर्द बना हुआ हूँ। अपने इस जीवन से मुझे संतोष है।

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