मेरा अद्भुत स्वप्न हिंदी निबंध My Funniest Dream Essay in Hindi

My Funniest Dream Essay in Hindi: ‘अल्लादीन का जादुई चिराग’ फिल्म देखकर बड़ी रात बीते मैं घर पहुँचा। बिस्तर पर लेटते ही मेरी आँख लग गई और नींद में मैंने एक सुंदर स्वप्न देखा। सपने में मैंने एक तेजस्वी महात्मा को देखा । उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया। मेरे सिर पर अपना हाथ फेरकर उन्होंने मुझे एक अंगूठी पहनाई और वे अदृश्य हो गए।

मेरा अद्भुत स्वप्न पर हिंदी में निबंध My Funniest Dream Essay in Hindi

मेरा अद्भुत स्वप्न पर हिंदी में निबंध My Funniest Dream Essay in Hindi

उत्तर ध्रुव में

अभी मैं अँगूठी की ओर देख ही रहा था कि इतने में मैं पृथ्वी के ऊपर उठकर उड़ने लगा और उड़ता-उड़ता उत्तरी ध्रुव पर पहुँच गया। वहाँ चारों ओर बर्फ ही बर्फ था ! अचानक मैंने उस अंगूठी पर हाथ फेर दिया। बस ! सभी ओर धुआँ ही धुआँ नजर आने लगा। सहसा एक भयानक आवाज आई और मैंने देखा कि एक सुंदर वायुयान मेरे सामने खड़ा है। उसमें चालक भी बैठा हुआ था। उसने मुझे बुलाया। मैं शीघ्र ही उस वायुयान पर सवार हो गया।

चंद्रलोक की सैर

वायुयान में बैठकर एक क्षण में ही हम लोग चंद्रलोक पहुँच गए । हम दोनों वायुयान से उतरे और इधर-उधर घूमने लगे। वहाँ चारों तरफ शीतलता का साम्राज्य था। चंद्रलोक की रंगबिरंगी चट्टानों की शोभा बड़ी निराली थी। था तो सब कुछ वीरान ही, फिर भी अत्यंत अद्भुत और दर्शनीय था।

बनावटी उपग्रह

थोड़ी देर के बाद कर्कश आवाज सुनाई देने लगी। सहसा किसी उपग्रह को हमारे बहुत ही करीब होकर गुजरते निकल जाते देखा । शीघ्र ही वायुयान में बैठकर हमने उसके पीछा किया, लेकिन न जाने वह कहाँ अदृश्य हो गया और हम मंगल की भूमि पर आकर रुक गए।

मंगल की भूमि में

मंगल पर पहुँचते ही हमारे आनंद की सीमा न रही। सचमुच, स्वर्ग यहाँ सागर हो उठा था। यहाँ के रास्तों के दोनों ओर चंदन के वृक्ष और मनोहर जलाशय थे। उसमें सुंदर कमल खिले थे और हंस तैर रहे थे। जगह-जगह सुंदर उद्यान बने थे। उनके एक उद्यान के द्वार और कमाने स्वर्ण से बनी हुई थीं। उद्यानों में फव्वारे थे, जिनसे सप्तरंगी जल की बूंदें उड़ रही थीं। यहाँ के निवासी भले, उदार और बलवान थे। उन्होंने हमारा हार्दिक स्वागत किया और हमसे पृथ्वीवासियों के समाचार पूछे । लौटते समय स्मृतिरूप में मैं उन्हें कुछ देना चाहता था। मेरे पास और कुछ तो था नहीं, इसलिए मेरा हाथ उस अंगूठी पर ही जा पहुँचा और …. |

स्वज की स्मृति

मेरा सलोना सपना टूट गया। मेरे पिताजी मुझे जोर-जोर से आवाज देकर जगा रहे थे। उठकर मैंने देखा कि चारों ओर धूप बिखर चुकी थी। देर न होती तो क्या होता, मैं चंद्रलोक और मंगललोक का सफर जो करता रहा ! शायद बिस्तर ही वायुयान बन गया था। कितना अनोखा और अद्भुत था वह स्वप्न!


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