सब्जी-मंडी में आधा घंटा हिंदी निबंध The Village Market Essay in Hindi

The Village Market Essay in Hindi: मैं शहर से बहुत दिन बाद गाँव आया था। एक दिन घूमते-घूमते अपने गाँव की सब्जी मंडी में पहुँच गया। अहा! कितनी चहल-पहल थी वहाँ । ऐसा लगता था जैसे शाक-सब्जियों और फलों की सुंदर प्रदर्शनी हो।

सब्जी-मंडी में आधा घंटा पर हिंदी में निबंध The Village Market Essay in Hindi

सब्जी-मंडी में आधा घंटा पर हिंदी में निबंध The Village Market Essay in Hindi

तरह-तरह की सब्जियाँ

मंडी में हरी और ताजी तरकारियों की भरमार थी। दुकानदारों ने उनको खूब सजाकर रखा था। कहीं आलू और प्याज के ढेर लगें थे, कहीं गोभी और बैंगन के । लौकी, परवल, मटर, टमाटर आदि की भी अपनी अपनी शान थी। लाल-लाल गाजर, लंबी-लंबी ककड़ियाँ और मोटी-मोटी मूलियाँ मन को ललचा रही थीं। सजाकर रखे गए नींबू मानो कह रहे थे-‘हम भी कुछ कम नहीं !’ पालक, मेथी, चौलाई जैसी सब्जियाँ अपने हरे-भरे रंग-रूप से सब्जी-मंडी की शोभा में चार चाँद लगा रही थी।

फलों की दुकाने

फलों की दुकानें भी कम आकर्षक न थीं । आम, पपीता, अनार, अंजीर, चीकू, जामुन आदि फलों के ढेर देखकर मुँह में पानी आ जाता था। लेकिन अधिकांश ग्राहकों की भीड़ तो शाक-सब्जियों की दुकानों पर ही लगी हुई थी। कुछ बाबू लोगों के सिवा फलों की तरफ देखने की कोई हिम्मत ही नहीं कर रहा था।

ग्राहक और दुकानदार

सब्जी-मंडी में तरह-तरह की आवाजें सुनाई दे रही थीं। कहीं भाव-ताल हो रहा था। कहीं ग्राहकों और दुकानदारों में पैसे के लिए झगड़ा हो रहा था। ग्राहक कहता था कि मैंने पैसे दिए है और दुकानदार कहता था कि पैसे नहीं दिए हैं । ईश्वर जाने कि कौन सच्चा था और कौन झूठा ! कहीं-कहीं दुकानदार के तराजू व तौल के विषय में शंकाएँ उठाई जा रही थीं। ऐसे तमाशे तो यहाँ रोज चलते ही रहते हैं।

सब्जी मंडी में ग्राहकों की अपनी शैलियाँ थीं। किसी-किसी ग्राहक की खरीदारी की कला देखते ही बनती थी। कुछ ग्राहक बड़े विनोदी थे। वे खुद भी हँस रहे थे और दुकानदार को भी हँसा रहे थे। कुछ ग्राहक अपने परिचितों से दिन पर दिन महँगी हो रही सब्जियों पर चिंता प्रकट कर रहे थे।

आपसी चर्चा

सब्जी-मंडी में तरह-तरह की शाक-भाजियों की तरह समाज के भी हर रूप के दर्शन हो रहे थे। कुछ लोगों के चेहरे पर खुशी की सुबह थी, तो कुछ के चेहरे पर उदासी की शाम । कुछ की जेब गरम थी, तो कुछ की ठंडी । कुछ ज्यादा पैसे देकर भी अच्छी चीज खरीद लेने को आतुर थे और कुछ बेचारे सस्ती सब्जियाँ ढूँढ रहे थे।

उपसंहार

सब्जी मंडी की उस चहल-पहल में आधा घंटा किस तरह बीत गया इसका पता ही न चला। सचमुच, सब्जी-मंडी हमें खरीदारी की कला सिखाती है। उसमें आधा घंटा बिताने से जो अनुभव मिलते हैं, वे भी उतने ही रोचक और लाभदायक होते हैं जितनी की सब्जी-मंडी की तरकारियाँ ।


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